Monday, 14 November 2016

पता चल गया सोनम गुप्ता बेवफा नहीं, आशिक कमीना है


'सोनम गुप्ता बेवफा है' क्या तुम भी यही मानते हो. क्या तुम सोनम का जवाब सुनना नहीं चाहोगे ? क्या उसे बोलने का मौका नहीं दोगे? मरने वाले से भी उसकी अंतिम इच्छा मालूम की जाती है. सोनम को जाने बिना बेवफा कहना नाइंसाफी होगी. मैं तो कहता हूं अच्छा किया जो उसने उस सिरफिरे आशिक को छोड़ दिया. क्योंकि उसे तो कभी सोनम से प्यार ही नहीं था. उसे सिर्फ चाहत थी सोनम को पाने की. उसे हासिल करने की. कभी उसने सोनम से इश्क ही नहीं किया. हासिल नहीं कर पाया तो कर दिया उसे बदनाम, वो भी सिर्फ 10 रुपये में. कितना नीच था जो सोनम की कीमत नहीं जान सका. और लिख दिया वो जो कभी किसी सच्चे आशिक ने अपनी महबूबा को नहीं कहा.

इस आशिक ने तो सोनम को बेवफा साबित कर दिया. एक हमारी आशिकी देखो कि जब 'सनम बेवफा' हुई तो हम उसके दीवाने हो गए. न जाने अबतक कितनी बार सनम बेवफा को देख चुके हैं. हर बार उतनी ही मोहब्बत होती है जितनी पहली बार देखने पर हुई थी. दिमाग के घोड़े न दौड़ाओ सलमान खान की फिल्म की बात कर रहा हूं. 'सनम बेवफा' 11 जनवरी 1991 में रिलीज हुई थी. मैं तो पैदा भी नहीं हुआ था. उसी साल 2 जुलाई को पैदा हुआ था. पहली बार जब सनम बेवफा देखी तो उसका एक गाना दिमाग में ऐसा फिट हुआ कि परेशानी में होता हूं तो मुंह से निकलता है, 'अल्लाह करम करना, लिल्लाह करम करना. बेकस पर रहम करना.' कर दुआ रहा होता हूं याद 'सनम बेवफा' आ जाती है. ये इश्क ही तो है. सोनम गुप्ता की रुसवाई देखकर और उसकी खामोशी पर बस ये ही दुआ है अल्लाह करम करना.

ये कैसा आशिक है जिसने सोनम को रुसवा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. नोट पर ऐसे लिख दिया 'सोनम गुप्ता बेवफा है.' जैसे कह रहा हो गुप्ता अंकल का मेडिकल खुला है. मुझे ये बेवफाई का नारा पढ़ कर वो दीवारें भी याद आती हैं जिन पर लिखा होता है गधे के पूत यहां न मूत. ऐसा लिखने वाली भी इस सिरफिरे आशिक की तरह ही नीच हैं, क्योंकि वो भी मूतने वाले को कुछ नहीं कह रहे, बल्कि उसके बाप को गधा बता रहे हैं, जिसके बाप को पता भी नहीं कि उसका बेटा कहां मूत रहा है. ये लिखा देखकर मुझे तो ऐसा लगता है जैसेमूतने वाला मूत तो दीवार पर रहा हो और वो मूत गिर रहा हो लिखने वाले के दिमाग में. अगर ऐसा न होता तो वो कभी भी दीवार पर बाप को गधा न लिखकर मूतने वाले को सबक सिखाता.

ये आशिक भी अगर सोनम से यक़ीनन इश्क करता तो कभी नोट पर ऊल-जलूल हरकत न करता. क्योंकि सोनम गुप्ता उसे नहीं मिली तो इसका मतलब ये तो नहीं हुआ कि वो बेवफा है. उसकी कुछ मजबूरियां रही होंगी. हो सकता है उसे बुखार आ गया हो. हो सकता है उसका एक्सीडेंट हो गया हो. हो सकता है उसकी ऑफिस में शिफ्ट चेंज हो गई हो और उसे घर से निकलने का टाइम न मिलता हो. हो सकता है कोई रिश्तेदार घर पर मेहमान बनकर आ गया हो. उसकी खातिर तवाजो में आशिक से मिलने की फुर्सत न मिली हो. तूने नोट पर लिखा है तो मान लेते हैं सोनम जानबूझकर नहीं आई. तो इसका बदला ये तो नहीं कि तुम उसके इश्क को सरकारी कर दो. और वो इश्क सबके हाथों में नाचे.

तुमने तो लिख दिया जो लिखना था. अब सोचो अगर तुम्हे यकीनन सोनम से इश्क था तो अब तुम्हारा इश्क बाजारों में लुटेगा. कोई उससे सब्जी मार्केट में कद्दू खरीदेगा. कोई मेडिकल से दर्द को खत्म करने के लिए डिस्प्रिन या सीने का जलन दूर करने के लिए ENO खरीदेगा, क्योंकि दस रुपये में ये ही सब मिल पाएगा और क्या मिलेगा ?

 वो नोट कभी इस हाथ में तो कभी इस हाथ में. दर-दर भटकेगा. कोई उस पर हंसेगा. कोई गरियाएगा. ऐ दिखावे वाले आशिक, ये सिर्फ चाहत थी तुम्हरी, सोनम को पाने की. मोहब्बत होती तो कभी अपने इश्क को यूं रुसवा न करता. खुद को आग के दरिया में डाल देता और अपने इश्क को बचा लेता.

ये भी तो हो सकता है कि इस आशिक की मोहब्बत 1993 में आई डर फिल्म के शाहरुख खान की तरह हो. क्या पता एकतरफा मान बैठा हो कि वही सोनम का बॉयफ्रेंड है. क्या पता सोनम किसी और से प्यार करती हो. और फिर ये आशिक डर फिल्म के शाहरुख खान की तरह उसे पाने के लिए स.स.स्स्स सोनम करता फिरा हो. क्योंकि शाहरुख खान भी तो क.क.कि किरन करता फिरा था पूरी फिल्म में. तुम जो भी हो मियां मिठ्ठू आशिक, ये सही नहीं है. तुम बहुत ही गलत हो. सोनम तुम्हे नहीं मिली तो उसे बेवफा घोषित कर दिया. अच्छा हुआ जो सोनम तुम्हारे साथ नहीं है. नहीं तो उसे 10 रुपये के लिए बेच भी सकते थे. सोनम तुम जहां भी हो खुश रहो. ये आशिक नहीं बन सकता.

Sunday, 8 May 2016

मां आज अनवर आपके हाथ की भिंडी भी खा लेगा

मां तुम सोशल मीडिया पर अपना घर क्यों नहीं बसा लेतीं। देखो आपके फरमाबरदार बेटे कितनी खूबसूरत बातें आपकी शान में लिख रहे हैं। "लव यू मॉम" कहते कहते प्यारी बेटियों के लबों पर खुशकी आ जा रही है। मां तुम देख भी पा रही हो या नहीं। या फिर बच्चों की भूख मिटाने के लिए चूल्हा संभाले बैठी हो।
सोशल मीडिया पर मां ही मां है, लेकिन मां तुम्हारी ये खामोशी बता रही है कि तुम इस बात की उलझन में बैठी हो रात को खाने में क्या बनाऊं, क्योंकि अनवर को भिंडी पसंद नहीं है, फोजिया को गोश्त से एलर्जी है और उनके पापा दाल पसंद नहीं करते हैं। फिर भी तुम सबकी पसंद पूरी कर देती हो। पसंद में जरा सी मिर्च तेज हुई तो खाना धरा रह जाता है और तुम्हारी मेहनत बेकार। तुम बेकार की उलझन मेे बैठी हो। मां आओ तुम्हें सोशल मीडिया की सैर करा दूं। देखो तुम्हारे बच्चे सुधर गए हैं। यहां सब अच्छा-अच्छा है। अनवर आपके हाथ की भिंडी खा लेगा, क्योंकि वो तो तुमसे बहुत प्यार करता है। यकीन नहीं आ रहा न तुमको, क्योंकि आज तक तुमने अनवर को मनमानी करते और झिड़कते ही देखा है। चलो तसल्ली करने के लिए आजका उसका फेसबुक स्टटेस चेक कर लो। पक्का तुम्हारी आंखें भर आएंगी इतनी मोहब्बत देखकर।
फोजिया ने तुमसे बात करना बंद कर दिया था, क्योंकि तुमने उसके पापा को उसके लिए स्कूटी खरीदने से मना कर दिया था। तुम्हें उसकी सुरक्षा की फिक्र थी। फोजिया ने तुम्हारे निहोरे करने के बाद भी पूरा दिन खाना नहीं खाया था न। देखो वही फोजिया आज कई साल पुरानी तुम्हारे साथ खींची गई तस्वीर इंस्टाग्राम पर शेयर कर रही है। उस तस्वीर पर उसने कैप्शन भी दिया है। "मेरी मां मेरी जिंदगी, लव यू मॉम"
 तुम भी न बेकार की फिक्र में मरी जा रही थीं कि बच्चे पता नहीं बड़े होकर किसके नक्शे कदम पर चलेंगे। अब मैं क्या बताऊं तुम खुद ही सोशल मीडिया पर देख लो वो तो अपना आइडल तुमको ही मानते हैं। मां सच कहूं सारे बहन भाइयों पर बेइंतेहा प्यार आ रहा है। मन कर रहा है कि सबके स्टटेस को चूमता रहूं, जो तुम्हारी ममता में उमड़ पड़े हैं। बस अफसोस इस बात का है, तुम ये सुख भोग नहीं सकोगी, क्योंकि तुम्हारा तो सोशल मीडिया पर अकाउंट ही नहीं है। तुम इस प्यार से भी वैसे ही वंचित रह जाओगी जैसे घर में सबकी ख्वाहिशें पूरी करने के चक्कर में अपनी ख्वाहिशों को किसी कोने में दफन कर देती हो। बस मेरी तो ये ही दुआ है कि सोशल मीडिया में छेद हो जाए, ताकि उस छेद से प्यार रिसकर तुम तक पहुंच जाए। 
 मां तुमसे एक बात कहूं बुरा न मानना। देर रात तुम अब बच्चों का इंतजार न करना बेफिक्र होकर सो जाना, वो क्या है न कि आज दोस्तों के साथ डिस्को पार्टी में आने से लेट हो जाएंगे। मदर्स डे तो सिर्फ सोशल मीडिया पर स्टटेस डालने के लिए ही होता है न। तुम मदर्स डे के फालतू बहकावे में मत आ जाना।

 आपके साथ सेल्फी खींचकर फेसबुक पर न डालने वाला
 आपका नालायक बेटा

Saturday, 7 May 2016

इश्क नफरतों के लिए जहर है

इश्क नफरतों के लिए जहर है


इश्क करने कराने की चीज नहीं। ये एक खुश्बू है, उसे समेटो। इश्क एहसास है, महसूस करो। इश्क किताब है, उसे पढ़ो। इश्क मासूम है, उसकी खताओं पर न जाओ। इश्क बंदगी है, कैद से न डरो। इश्क मौसम है, खुद को उसके तापमान में ढालो। इश्क दो जिस्मों का मिलन नहीं, रूहों का सुकून है। इश्क कोई मंजिल नहीं, एक सफर है, गुनगुनाते चलो। इश्क कस्तूरी है, उसे महकाओ, उसकी तलाश में मृग न बनो।   ....... जहां पहरा है, वहां इश्क है। जहां कोई रूठा है वहां इश्क है। जहां जिद है, वहां इश्क है। जहां वादा है, वहां इश्क है। उसकी पसंद, इश्क है। उसका मनना-मनाना इश्क है। हर रिश्ते में इश्क है। हर दिन इश्क है। हर लम्हा इश्क है। ....... "इश्क मुकम्मल नहीं, अधूरापन इश्क है।" इश्क में चलने की कोई तकनीक नहीं, कभी पगडंडी इश्क है तो कभी गुमनाम राहें इश्क हैं।
.... इश्क पहचान है। इश्क दास्तान है। इश्क मिसाल है। कोई काम मुश्किल नहीं, अगर इश्क है। इश्क करो, इश्क नफरतों के लिए जहर है।...

 #इश्क #प्यार #मोहब्बत

Sunday, 2 February 2014

विजय शंखनाद 
के बहाने वोटों का ध्रुवीकरण                                                          

आ गए न अपनी हकीकत पर विकास की राजनीति का ढोंग रचाने वाले। भाजपा मोदी का चेहरा दिखाकर वोटों का धु्रवीकरण करना चाहती है। 2002 के दंगे लोगों के जहन में घर कर गए हैं। इतना ही नहीं क्लीन चिट मिलने के बावजूद मोदी की छवि दंगों वाली ही बनी हुई है। इसलिए भाजपा का मेरठ में विजय शंखनाद रैली का मकसद मुजफ्फरनगर के दंगों को लोकसभा चुनाव के लिए कैश करना था। इसके जरिए भाजपा मोदी की हिंदुत्व वाली छवि को और मजबूत करना चाहती है। यही वजह थी कि भाजपा विधायक संगीत सोम पर आरोप लगने के बाद सोम को मोदी ने सम्मानित किया। दंगा पीड़ितों के लिए कोई दर्द नहीं, कोई दुख नहीं सिर्फ और सिर्फ राजनीति। अगर दर्द है तो सिर्फ इस बात का, कि कांग्रेस ने 60 साल शासन किया। मुझे 60 माह ही दे दो। नक्शा बदलकर रख देंगे। वादा करते हैं चाय बेची है देश नहीं बेचेंगे। फेरे लेते वक्त बीवी का साथ देने का वादा किया होगा, लेकिन बीवी का साथ दे न सके देश का साथ देने चले हैं। 

मोदी की पत्नी का इंटरव्यू पढ़ा आपने?

'आरएसएस शाखाओं में गुजारते थे वक्त'

'आरएसएस शाखाओं में गुजारते थे वक्त'

सवालः क्या उन्होंने कभी आपसे कहा कि वह आपको छोड़ रहे हैं या शादी का रिश्ता खत्‍म कर रहे हैं?

जशोदाबेनः उन्होंने एक बार कहा था, "मुझे देश भर में घूमना है और जहां मेरा मन करेगा, मैं वहां चला जाऊंगा, तुम मेरे पीछे आकर क्या करोगी?" जब मैं उनके परिवार के साथ रहने के लिए वाडनगर आई, तो उन्होंने मुझसे कहा, "अभी तुम्हारी उम्र ज्यादा नहीं है, फिर तुम अपने ससुराल में रहने के लिए क्यों आ गईं? तुम्हें अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए।" अलग होने का फैसला मेरा था और हमारे बीच कभी कोई टकराव नहीं हुआ।

वो मुझसे आरएसएस या किसी और राजनीतिक विचारधारा की बात कभी नहीं करते थे। जब उन्होंने मुझे बताया कि वह मनमुताबिक देश भर में घूमना चाहते हैं, तो मैंने कहा कि मैं भी उनके साथ आना चाहूंगी। हालांकि, कई मौकों पर जब मैं अपने ससुराल गई, तो वह वहां नहीं होते थे और उन्होंने वहां आना भी छोड़ दिया। वह काफी वक्‍त आरएसएस शाखाओं में गुजारा करते थे। इसलिए मैंने एक वक्‍त के बाद वहां जाना छोड़ दिया और अपने पिता के घर लौट गई।                                                                                                                                                                                                                                                    
यह हकीकत है कि आतंकवाद एक बड़ा मुद्दा है जिससे पार पाना बहुत जरूरी है ये देश की जड़ें खोखली कर देता है, लेकिन भाजपा के पास इस मुद्दे पर बोलने के अलावा कुछ नहीं है। कभी दंगों पर बोलते हैं कभी मंदिर पर तो कभी आतंकवाद पर। दंगों की राजनीति में समाजवादी पार्टी भी पीछे नहीं रहने वाली थी, क्योंकि उसे भी लोस चुनाव में मुस्लिम वोट चाहिए। मौका भी था और दस्तूर भी। हो गया ऐलान सहारनपुर में विशाल जनसभा करने का। शासन में होने के बावजूद रैलियां करने की जरूरत पड़ रही है सपा को। मुस्लिम वोटर को राजी भी तो रखना है ना। नहीं तो प्रधानमंत्री बनना ख्याली पुलाव बनकर रह जाएगा। मुस्लिम मतदाता को हाथ से फिसलता देख चंद मुस्लिम नेताओं को लाल बत्तियां बांट दी गईं। सैफई मस्ती में कब वक्त गुजर गया कुछ पता ही नहीं चला मुख्यमंत्री अखिलेश को। उम्मीदें बहुत थीं युवा मुख्यमंत्री से, लेकिन बबलू हैप्पी बहुत था इसलिए सैफई में डीजे तो बजना ही था। डीजे की गूंज, दंगों के दर्द को छिपाने में नाकामयाब रही।                                                                    
मोदी की पत्नी का इंटरव्यू             

http://www.amarujala.com/feature/samachar/national/i-know-he-will-become-pm-one-day-says-modi-s-wife/

Saturday, 9 March 2013

मीडिया को आत्म नियमन में सौदेबाज़ी से बचना होगा


 आज मीडिया ने जिस तरह से अपने स्वरूप में बदलाव किया है या यह कहें कि देश के आन्दोलनों में मीडिया ने जिस तरह से बढ़ चढ़कर हिस्सेदारी ली है। उससे राजनेताओं को अपने वजूद और पावर के खो जाने का खतरा सताने लगा है। इसी डर से उनकी तरफ से मीडिया नियमन का डमरू बजने लगा है। कहा जाने लगा है कि मीडिया अपनी सीमा रेखा को लांघ रहा है। वह सामाजिक सरोकार भूल रहा है। वह अनाप-शनाप बकता है। जो नहीं दिखाना चाहिए वह भी दिखाता है जिससे आराजकता फैलने के अन्देशे कुछ ज़्यादा हैं। इसलिए इसको रेग्यूलेट किया जाना ज़रूरी है। इन्ही राजनेताओं के साथ साथ अन्य दूसरे लोग भी जो इनकी जी हुज़़ूरी में लगे रहते हैं वह भी मीडिया नियमन के शिगुफे पर ज़्यादा ज़ोर दे रहे हैं। यह सब बाते उनकी तरफ से ज़्यादा हो रहीं हैं जो खुद रेग्यूलेट नहीं हैं। चाहें वो राजनेता हों या फिर कोई और। वह मीडिया को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहते। क्योंकि उनमें सत्ता की ललक है वह मीडिया को अपने नियंत्रण में रखना चाहते हैं।
      दूसरी तरफ मीडिया को उन्नीसों पिचहत्तर से ही सरकारी नियंत्रण में जाने का खतरा सताता रहता है। इसलिए वह आत्म नियमन की ढकोसले बाज़ी करके कारपोरेट की धूर्तता को नज़र अन्दाज़ कर देता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई देता है। लेकिन अब सवाल यहां यह पैदा होता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसको है ? रिर्पोटर को, एडिटर को, या फिर मालिक को ? आज ख़बरों का स्वरूप बदलकर उसको सबके सामने पेश किया जा रहा है। हक़ीक़त को छुपाया जा रहा है। अगर यह कहें कि मालिक या कारपोरेट की मजऱ्ी दिखायी जाती है तो अतिश्योक्ति नहीं होगा। पत्रकारों के श्रमिक अधिकारों को छीन लिया गया है। पत्रकारों को सुरक्षा दिऐ बिना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करना बेमानी होगा।
      आज जिस तरह से मीडिया में संकेन्द्रण की प्रवृत्ति ने ज़ोर पकड़ रख है उससे सबसे ज़्यादा ख़तरा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को है। क्राॅस मीडिया होल्डिंग ख़बरों के फलक को संकीर्ण कर रहा है। इसलिए मीडिया नियमन से ज़्यादा ज़रूरी है कि कारपोरेट और मीडिया के बीच एक लक्ष्मण रेखा तय की जाये ताकि लोगों के जानने के हक़ पर अघात न पहुंचे। यद्यपि कोई आत्म नियमन करना चाहता है तो करे लेकिन उसकी आड़ में अपने काले कारनामों पर पर्दा डालने की कोशिश न करे। जिस तरह से प्रेस परिषद अध्यक्ष नियमन की बात कर रहें हैं उससे तो यह लगता है कि वह मीडिया में तानाशाही की बात कर रहे हैं कि सारी पावर परिषद यानि उनके हाथ में आ जाये। अगर मीडिया को साफ सुथरा बनाने की बात होती प्रेस परिषद ने अब तक के समय में क्यों कोई ऐसे उदाहरण पेश नहीं किए जिससे लगता कि हां प्रेस परिषद अच्छा काम कर रही है और वह मीडिया पर लगातार नज़र बनाऐ हुऐ है बल्कि हर मामले में वह उदासीन बनी रहती है। फिर यह कैसे मान लिया जाए कि नियमन की जि़म्मेदारी वह सही ढंग से निभा पायेगी।
      मीडिया ने जो समाज में उत्सुकता और चेतना को कायम करने का प्रयास किया है उसको बरक़रार रखने के लिए ज़रूरी है कि वह नियमन के ज़रिए पावर हासिल करने के बजाये मीडिया से कारपोरेट के मकड़जाल को हटाने की कोशिश करे ताकि सही मायनो में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बाकी रहे।
      चाहें सरकार हो या फिर प्रेस परिषद जैसी संस्थाएं या फिर मीडिया मालिक हर कोई कारपोरेट के लिए नत मस्तक है। जो नियमन और आत्म नियमन की बात तो करते हैं और कारपोरेट के मीडिया पर हावी होने की बात पर चुप्पी साधे रहते हैं।
      मीडिया नियमन या फिर सेंसरशिप दोनों ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कट्टर दुश्मन है यह जानते हुए नियमन की बात करना बेवकूफी होगा। ज़रूरी है कि आत्म नियमन के लिए जो बाॅडी बनी है उसको मज़बूती दी जाए साथ ही उसको निष्पक्षता और प्रभावी ढंग से करने के लिए प्रेरित किया जाऐ। या फिर मीडिया संस्थानों के गलती करने पर शिकायत दर्ज करके इतना दबाव बनाया जाए जिससे उसके प्रति आत्म नियमन वाली बाॅडी उस पर कार्रवाई कर सके। यद्यपि बाहर से कोई मीडिया को रेग्यूलेट करता है तो मीडिया केवल मदारी के इशारों पर नाचने वाली बन्दरिया बनकर रह जाएगा। मीडिया को बन्दरिया बनने से बचाने के साथ साथ कारपोरेट, संकेन्द्रण, क्राॅस मीडिया होल्डिंग जैसे तत्वों से एक दूरी या सीमा रेखा तय होनी चाहिए। वहीं मीडिया को भी आत्म नियमन के लिए प्रतिबध्दता दिखानी होगी उसे साबित करना होगा कि वह आत्म नियमन में किसी भी तरह की सौदेबाज़ी नहीं करेगा।

Thursday, 24 January 2013

स्मोकिंग का फैशन हैं जान लेवा


        

  नो स्मोकिंग या तम्बाकू सेवन सेहत के लिए हानिकारक है। ये शब्द अक्सर दुकानों के बाहर, दीवारों पर लगे पोस्टरों में किसी अखबार के पन्ने पर और कालेजों के नोटिस बोर्ड पर लिखे हुए देखे जा सकते हैं। हैरानी की बात है जहां यह शब्द लिखे होते हैं, उन्हीं जगहों पर लोग गुटखा, तम्बाकू खाते और सिगरेट सुलगाते हुए मिल जाते हैं।
      अखबार और टीवी चैनलों में तम्बाकू अभियान से होने वाली बीमारियो व इससे बचने के उपायों का प्रसारण भी किया जाता है वहीं लोग अपने हाथ में बीड़ी व सिगरेट लिए उस विज्ञापन को बड़े ही इतमीनान से देख रहे होते हैं। इसी के साथ सरकारी संस्थान भी जगह जगह कैम्प लगाते हैं जिन में तंबाकू के सेवन से होने वाली दमा, कैंसर, रक्तचाप का बढ़ना या घटना जैसी बीमारियोें के बारे में लम्बा चैड़ा लेक्चर दिया जाता है। साथ ही तम्बाकू के उत्पाद पर वैधानिक चेतावनी भी प्रकाशित होती है। जिसका कोई असर नही होता और नतीजा ज़ीरो ही रहता है।

आमतौर पर देखा जाये तो तम्बाकू का सेवन करना, यह केवल एक बुरी लत नहीं है बल्कि यह आज-कल की युवा पीढ़ी के लिए स्टेटस सिंबल सा बन गया है जहां युवा पीढ़ी को सिगरेट सुलगाते हुए दिल्ली में कई जगहों पर आराम से देखा जा सकता है वहीं कालेजों के बाहर यह नज़ारा आम होता है। इसी कड़ी में ज़्यादातर कालेजों और संस्थानों के पास वाली दुकान या मार्केट में दो चार छात्र-छात्राओं का झुण्ड आपको सिगरेट के कश लगाता हुआ मिल जायेगा। इस उम्र के लड़के-लड़कियां स्मोकिंग को एक फैशन समझ कर शुरू करते है। उनका यही फैशन कब उनकी कमजोरी बन जाता है। उन्हें पता ही नहीं चलता और धीरे-धीरे फिर यह जान लेवा बीमारियों का शिकार हो जाते हैं। पर वह इस फैशन की लत में यह भूल जाते हैं कि उनका सिगरेट का हर कश उनकी सांसो को भी एक-एक करके धुएं में उड़ा रहा है। युवा फैशन के चक्कर में स्मोकिंग के ऐसे भंवर में फंस जाते हैं कि इस से निकलना भी चाहे तो वे निकल नहीं पाते हैं जो उनके लिए जानलेवा साबित होता है।